मनुष्यको चाहिये कि अपनेसे अधिक गुणवान्को देखकर प्रसन्न हो; जो कम गुणवाला हो, उसपर दया करे और जो अपने समान गुणवाला हो, उससे मित्रताका भाव रखे। यों करनेसे उसे दुःख कभी नहीं दबा सकते॥ ३४॥✎ 367368
गुणाधिकान्मुदं लिप्सेदनुक्रोशं गुणाधमात्।
मैत्रीं समानादन्विच्छेन्न तापैरभिभूयते॥ ३४
मनुष्यको चाहिये कि अपनेसे अधिक गुणवान्को देखकर प्रसन्न हो; जो कम गुणवाला हो, उसपर दया करे और जो अपने समान गुणवाला हो, उससे मित्रताका भाव रखे। यों करनेसे उसे दुःख कभी नहीं दबा सकते॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 446) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)