श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.33

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यस्य यद् दैवविहितं स तेन सुखदुःखयोः।

आत्मानं तोषयन्देही तमसः पारमृच्छति॥ ३३

yasya yad daivavihitaṃ sa tena sukhaduḥkhayoḥ|

ātmānaṃ toṣayandehī tamasaḥ pāramṛcchati|| 33

अर्थ

विधाताके विधानके अनुसार सुख-दुःख जो कुछ भी प्राप्त हो, उसीमें चित्तको सन्तुष्ट रखना चाहिये। यों करनेवाला पुरुष मोहमय संसारसे पार हो जाता है॥ ३३॥✎ 367 368

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #367 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #368 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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