॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.8.41
धर्मार्थकाममोक्षाख्यं य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः।
एकमेव हरेस्तत्र कारणं पादसेवनम्॥ ४१
dharmārthakāmamokṣākhyaṃ ya icchecchreya ātmanaḥ|
ekameva harestatra kāraṇaṃ pādasevanam|| 41
अर्थ
जिस पुरुषको अपने लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप पुरुषार्थकी अभिलाषा हो, उसके लिये उनकी प्राप्तिका उपाय एकमात्र श्रीहरिके चरणोंका सेवन ही है॥ ४१॥