इस प्रकार धारणा करते-करते जब चित्त स्थिर और एकाग्र हो जाय तब उन वरदायक प्रभुका मन-ही-मन इस प्रकार ध्यान करे कि वे मेरी ओर अनुरागभरी दृष्टिसे निहारते हुए मन्द-मन्द मुसकरा रहे हैं॥ ५१॥✎ 369
स्मयमानमभिध्यायेत्सानुरागावलोकनम्।
नियतेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम्॥ ५१
इस प्रकार धारणा करते-करते जब चित्त स्थिर और एकाग्र हो जाय तब उन वरदायक प्रभुका मन-ही-मन इस प्रकार ध्यान करे कि वे मेरी ओर अनुरागभरी दृष्टिसे निहारते हुए मन्द-मन्द मुसकरा रहे हैं॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 448) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/51/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)