nirvṛtyā parayā tūrṇaṃ sampannaṃ na nivartate|| 52
अर्थ
भगवान्की मंगलमयी मूर्तिका इस प्रकार निरन्तर ध्यान करनेसे मन शीघ्र ही परमानन्दमें डूबकर तल्लीन हो जाता है और फिर वहाँसे लौटता नहीं॥ ५२॥✎ 369
एवं भगवतो रूपं सुभद्रं ध्यायतो मनः।
निर्वृत्या परया तूर्णं सम्पन्नं न निवर्तते॥ ५२
भगवान्की मंगलमयी मूर्तिका इस प्रकार निरन्तर ध्यान करनेसे मन शीघ्र ही परमानन्दमें डूबकर तल्लीन हो जाता है और फिर वहाँसे लौटता नहीं॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 448) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)