श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.61

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

विरक्तश्चेन्द्रियरतौ भक्तियोगेन भूयसा।

तं निरन्तरभावेन भजेताद्धा विमुक्तये॥ ६१

viraktaścendriyaratau bhaktiyogena bhūyasā|

taṃ nirantarabhāvena bhajetāddhā vimuktaye|| 61

अर्थ

यदि उपासकको इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंसे वैराग्य हो गया हो तो वह मोक्षप्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक अविच्छिन्‍नभावसे भगवान्‌का भजन करे॥ ६१॥

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