यदि उपासकको इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंसे वैराग्य हो गया हो तो वह मोक्षप्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक अविच्छिन्नभावसे भगवान्का भजन करे॥ ६१॥
विरक्तश्चेन्द्रियरतौ भक्तियोगेन भूयसा।
तं निरन्तरभावेन भजेताद्धा विमुक्तये॥ ६१
यदि उपासकको इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंसे वैराग्य हो गया हो तो वह मोक्षप्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक अविच्छिन्नभावसे भगवान्का भजन करे॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 449) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/61/