श्रीनारदजीसे इस प्रकार उपदेश पाकर राजकुमार ध्रुवने परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने भगवान्के चरणचिह्नोंसे अंकित परम पवित्र मधुवनकी यात्रा की॥ ६२॥
इत्युक्तस्तं परिक्रम्य प्रणम्य च नृपार्भकः।
ययौ मधुवनं पुण्यं हरेश्चरणचर्चितम्॥ ६२
श्रीनारदजीसे इस प्रकार उपदेश पाकर राजकुमार ध्रुवने परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने भगवान्के चरणचिह्नोंसे अंकित परम पवित्र मधुवनकी यात्रा की॥ ६२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.62 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 449) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/62/