ध्रुवके तपोवनकी ओर चले जानेपर नारदजी महाराज उत्तानपादके महलमें पहुँचे। राजाने उनकी यथायोग्य उपचारोंसे पूजा की; तब उन्होंने आरामसे आसनपर बैठकर राजासे पूछा॥ ६३॥
तपोवनं गते तस्मिन्प्रविष्टोऽन्तःपुरं मुनिः।
अर्हितार्हणको राज्ञा सुखासीन उवाच तम्॥ ६३
ध्रुवके तपोवनकी ओर चले जानेपर नारदजी महाराज उत्तानपादके महलमें पहुँचे। राजाने उनकी यथायोग्य उपचारोंसे पूजा की; तब उन्होंने आरामसे आसनपर बैठकर राजासे पूछा॥ ६३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.63 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 449) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/63/