श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.64

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नारद उवाच

राजन् किं ध्यायसे दीर्घं मुखेन परिशुष्यता।

किं वा न रिष्यते कामो धर्मो वार्थेन संयुतः॥ ६४

rājan kiṃ dhyāyase dīrghaṃ mukhena pariśuṣyatā|

kiṃ vā na riṣyate kāmo dharmo vārthena saṃyutaḥ|| 64

अर्थ

श्रीनारदजीने कहा—राजन्! तुम्हारा मुख सूखा हुआ है, तुम बड़ी देरसे किस सोच-विचारमें पड़े हो? तुम्हारे धर्म, अर्थ और काममेंसे किसीमें कोई कमी तो नहीं आ गयी?॥ ६४॥

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