श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.77

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाशयम्।

ध्यायन्भगवतो रूपं नाद्राक्षीत्किंचनापरम्॥ ७७

sarvato mana ākṛṣya hṛdi bhūtendriyāśayam|

dhyāyanbhagavato rūpaṃ nādrākṣītkiṃcanāparam|| 77

अर्थ

उस समय उन्होंने शब्दादि विषय और इन्द्रियोंके नियामक अपने मनको सब ओरसे खींच लिया तथा हृदयस्थित हरिके स्वरूपका चिन्तन करते हुए चित्तको किसी दूसरी ओर न जाने दिया॥ ७७॥

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