श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! जब शुभ संकल्पवाले मतिमान् ध्रुवजीने इस प्रकार स्तुति की तब भक्तवत्सल भगवान् उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे॥ १८॥
अथाभिष्टुत एवं वै सत्संकल्पेन धीमता।
भृत्यानुरक्तो भगवान् प्रतिनन्द्येदमब्रवीत्॥ १८
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! जब शुभ संकल्पवाले मतिमान् ध्रुवजीने इस प्रकार स्तुति की तब भक्तवत्सल भगवान् उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 455) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/18/