श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.42

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तं दृष्ट्वोपवनाभ्याश आयान्तं तरसा रथात्।

अवरुह्य नृपस्तूर्णमासाद्य प्रेमविह्वलः॥ ४२

taṃ dṛṣṭvopavanābhyāśa āyāntaṃ tarasā rathāt|

avaruhya nṛpastūrṇamāsādya premavihvalaḥ|| 42

अर्थ

ध्रुवजी उपवनके पास आ पहुँचे, उन्हें देखते ही महाराज उत्तानपाद तुरंत रथसे उतर पड़े। पुत्रको देखनेके लिये वे बहुत दिनोंसे उत्कण्ठित हो रहे थे। उन्होंने झटपट आगे बढ़कर प्रेमातुर हो, लंबी-लंबी साँसें लेते हुए, ध्रुवको भुजाओंमें भर लिया। अब ये पहलेके ध्रुव नहीं थे, प्रभुके परमपुनीत पादपद्मोंका स्पर्श होनेसे इनके समस्त पाप-बन्धन कट गये थे॥ ४२-४३॥✎ 1946

यह अर्थ श्लोक 42–43 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1946 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): बिभूषित → विभूषित

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