ध्रुवजी भविष्यमें अविचल पद प्राप्त करनेवाले थे। इस समय शंखका स्पर्श होते ही उन्हें वेदमयी दिव्यवाणी प्राप्त हो गयी और जीव तथा ब्रह्मके स्वरूपका भी निश्चय हो गया। वे अत्यन्त भक्तिभावसे धैर्यपूर्वक विश्वविख्यात कीर्तिमान् श्रीहरिकी स्तुति करने लगे॥ ५॥✎ 374
स वै तदैव प्रतिपादितां गिरं
दैवीं परिज्ञातपरात्मनिर्णयः।
तं भक्तिभावोऽभ्यगृणादसत्वरं
परिश्रुतोरुश्रवसं ध्रुवक्षितिः॥ ५
ध्रुवजी भविष्यमें अविचल पद प्राप्त करनेवाले थे। इस समय शंखका स्पर्श होते ही उन्हें वेदमयी दिव्यवाणी प्राप्त हो गयी और जीव तथा ब्रह्मके स्वरूपका भी निश्चय हो गया। वे अत्यन्त भक्तिभावसे धैर्यपूर्वक विश्वविख्यात कीर्तिमान् श्रीहरिकी स्तुति करने लगे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 452) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/9/5/