श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स वै तदैव प्रतिपादितां गिरं

दैवीं परिज्ञातपरात्मनिर्णयः।

तं भक्तिभावोऽभ्यगृणादसत्वरं

परिश्रुतोरुश्रवसं ध्रुवक्षि१तिः॥ ५

sa vai tadaiva pratipāditāṃ giraṃ

daivīṃ parijñātaparātmanirṇayaḥ|

taṃ bhaktibhāvo'bhyagṛṇādasatvaraṃ

pariśrutoruśravasaṃ dhruvakṣitiḥ|| 5

अर्थ

ध्रुवजी भविष्यमें अविचल पद प्राप्त करनेवाले थे। इस समय शंखका स्पर्श होते ही उन्हें वेदमयी दिव्यवाणी प्राप्त हो गयी और जीव तथा ब्रह्मके स्वरूपका भी निश्‍चय हो गया। वे अत्यन्त भक्तिभावसे धैर्यपूर्वक विश्‍वविख्यात कीर्तिमान् श्रीहरिकी स्तुति करने लगे॥ ५॥✎ 374

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—स्थितिः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 452)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #374 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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