॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.9.6
ध्रुव उवाच
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां
संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम्॥ ६
yo'ntaḥ praviśya mama vācamimāṃ prasuptāṃ
saṃjīvayatyakhilaśaktidharaḥ svadhāmnā|
anyāṃśca hastacaraṇaśravaṇatvagādīn
prāṇānnamo bhagavate puruṣāya tubhyam|| 6
अर्थ
ध्रुवजीने कहा—प्रभो! आप सर्वशक्तिसम्पन्न हैं; आप ही मेरे अन्तःकरणमें प्रवेशकर अपने तेजसे मेरी इस सोयी हुई वाणीको सजीव करते हैं तथा हाथ, पैर, कान और त्वचा आदि अन्यान्य इन्द्रियों एवं प्राणोंको भी चेतनता देते हैं। मैं आप अन्तर्यामी भगवान्को प्रणाम करता हूँ॥ ६॥✎ 375