श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.26.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अथेदानीं प्रतिषिद्धलक्षणस्याधर्मस्य तथैव कर्तुः२ श्रद्धाया वैसादृश्यात्कर्मफलं विसदृशं भवति या ह्यनाद्यविद्यया३ कृतकामानां तत्परिणामलक्षणाः सृतयः सहस्रशः प्रवृत्तास्तासां प्राचुर्येणानुवर्णयिष्यामः॥ ३॥

athedānīṃ pratiṣiddhalakṣaṇasyādharmasya tathaiva kartuḥ śraddhāyā vaisādṛśyātkarmaphalaṃ visadṛśaṃ bhavati yā hyanādyavidyayā kṛtakāmānāṃ tatpariṇāmalakṣaṇāḥ sṛtayaḥ sahasraśaḥ pravṛttāstāsāṃ prācuryeṇānuvarṇayiṣyāmaḥ|| 3||

अर्थ

इसी प्रकार निषिद्ध कर्मरूप पाप करनेवालोंको भी उनकी श्रद्धाकी असमानताके कारण समान फल नहीं मिलता। अतः अनादि अविद्याके वशीभूत होकर कामनापूर्वक किये हुए उन निषिद्ध कर्मोंके परिणाममें जो हजारों तरहकी नारकी गतियाँ होती हैं, उनका विस्तारसे वर्णन करेंगे॥ ३॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कर्तृश्रद्धायाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 686)
  2. ३

    प्रा० पा०—विद्याकामानां।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 686)

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