triguṇatvātkartuḥ śraddhayā karmagatayaḥ pṛthagvidhāḥ sarvā eva sarvasya tāratamyena bhavanti|| 2||
अर्थ
श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! कर्म करनेवाले पुरुष सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके होते हैं तथा उनकी श्रद्धाओंमें भी भेद रहता है। इस प्रकार स्वभाव और श्रद्धाके भेदसे उनके कर्मोंकी गतियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं और न्यूनाधिकरूपमें ये सभी गतियाँ सभी कर्ताओंको प्राप्त होती हैं॥ २॥
त्रिगुणत्वात्कर्तुः श्रद्धया कर्मगतयः पृथग्विधाः सर्वा एव सर्वस्य तारतम्येन भवन्ति॥ २॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! कर्म करनेवाले पुरुष सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके होते हैं तथा उनकी श्रद्धाओंमें भी भेद रहता है। इस प्रकार स्वभाव और श्रद्धाके भेदसे उनके कर्मोंकी गतियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं और न्यूनाधिकरूपमें ये सभी गतियाँ सभी कर्ताओंको प्राप्त होती हैं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.26.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 686) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/26/2/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—कर्तृश्रद्धायाः।
(मुद्रित पृष्ठ 686)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1065 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): त्रिगुणत्वात्कर्तु:१ → त्रिगुणत्वात्कर्तुः