श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.13.9

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तमश्‍वमेधेन महामखेन

श्रद्धान्वितोऽस्माभिरनुष्ठितेन ।

हत्वापि सब्रह्म चराचरं त्वं

न लिप्यसे किं खलनिग्रहेण॥ ९

tamaśvamedhena mahāmakhena

śraddhānvito'smābhiranuṣṭhitena |

hatvāpi sabrahma carācaraṃ tvaṃ

na lipyase kiṃ khalanigraheṇa|| 9

अर्थ

हमलोग ‘अश्‍वमेध’ नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे। उसके द्वारा श्रद्धापूर्वक भगवान्‌की आराधना करके तुम ब्रह्मापर्यन्त समस्त चराचर जगत‍्की हत्याके भी पापसे लिप्त नहीं होगे। फिर इस दुष्टको दण्ड देनेके पापसे छूटनेकी तो बात ही क्या है॥ ९॥✎ 533

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #533 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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