श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब राजा चित्रकेतुने इस प्रकार प्रार्थना की, तब सर्वसमर्थ एवं परम कृपालु ब्रह्मपुत्र भगवान् अंगिराने त्वष्टा देवताके योग्य चरु निर्माण करके उससे उनका यजन किया॥ २७॥
इत्यर्थितः स भगवान् कृपालुर्ब्रह्मणः सुतः।
श्रपयित्वा चरुं त्वाष्ट्रं त्वष्टारमयजद् विभुः॥ २७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब राजा चित्रकेतुने इस प्रकार प्रार्थना की, तब सर्वसमर्थ एवं परम कृपालु ब्रह्मपुत्र भगवान् अंगिराने त्वष्टा देवताके योग्य चरु निर्माण करके उससे उनका यजन किया॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 771) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/14/27/