वे आपसमें कहने लगीं—‘अरी बहिनो! पुत्रहीन स्त्री बहुत ही अभागिनी होती है। पुत्रवाली सौतें तो दासीके समान उसका तिरस्कार करती हैं। और तो और, स्वयं पतिदेव ही उसे पत्नी करके नहीं मानते। सचमुच पुत्रहीन स्त्री धिक्कारके योग्य है॥ ४०॥✎ 540
धिगप्रजां स्त्रियं पापां पत्युश्चागृहसम्मताम्।
सुप्रजाभिः सपत्नीभिर्दासीमिव तिरस्कृताम्॥ ४०
वे आपसमें कहने लगीं—‘अरी बहिनो! पुत्रहीन स्त्री बहुत ही अभागिनी होती है। पुत्रवाली सौतें तो दासीके समान उसका तिरस्कार करती हैं। और तो और, स्वयं पतिदेव ही उसे पत्नी करके नहीं मानते। सचमुच पुत्रहीन स्त्री धिक्कारके योग्य है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 772) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/14/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)