भला, दासियोंको क्या दुःख है? वे तो अपने स्वामीकी सेवा करके निरन्तर सम्मान पाती रहती हैं। परन्तु हम अभागिनी तो इस समय उनसे भी गयी-बीती हो रही हैं और दासियोंकी दासीके समान बार-बार तिरस्कार पा रही हैं॥ ४१॥✎ 540
दासीनां को नु सन्तापः स्वामिनः परिचर्यया।
अभीक्ष्णं लब्धमानानां दास्या दासीव दुर्भगाः॥ ४१
भला, दासियोंको क्या दुःख है? वे तो अपने स्वामीकी सेवा करके निरन्तर सम्मान पाती रहती हैं। परन्तु हम अभागिनी तो इस समय उनसे भी गयी-बीती हो रही हैं और दासियोंकी दासीके समान बार-बार तिरस्कार पा रही हैं॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 772) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/41/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)