परीक्षित्! इस प्रकार वे रानियाँ अपनी सौतकी गोद भरी देखकर जलती रहती थीं और राजा भी उनकी ओरसे उदासीन हो गये थे। फलतः उनके मनमें कृतद्युतिके प्रति बहुत अधिक द्वेष हो गया॥ ४२॥✎ 540
एवं सन्दह्यमानानां सपत्न्याः पुत्रसम्पदा।
राज्ञोऽसम्मतवृत्तीनां विद्वेषो बलवानभूत्॥ ४२
परीक्षित्! इस प्रकार वे रानियाँ अपनी सौतकी गोद भरी देखकर जलती रहती थीं और राजा भी उनकी ओरसे उदासीन हो गये थे। फलतः उनके मनमें कृतद्युतिके प्रति बहुत अधिक द्वेष हो गया॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 772) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/14/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)