श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

राजोवाच

कथं त आसुरं भावमपोह्यौत्पत्तिकं गुरो।

इन्द्रेण प्रापिताः सात्म्यं किं तत्साधु कृतं हि तैः॥ २०

kathaṃ ta āsuraṃ bhāvamapohyautpattikaṃ guro|

indreṇa prāpitāḥ sātmyaṃ kiṃ tatsādhu kṛtaṃ hi taiḥ|| 20

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! मरुद्गणने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया था, जिसके कारण वे अपने जन्मजात असुरोचित भावको छोड़ सके और देवराज इन्द्रके द्वारा देवता बना लिये गये?॥ २०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें