इन्द्रेण प्रापिताः सात्म्यं किं तत्साधु कृतं हि तैः॥ २०
kathaṃ ta āsuraṃ bhāvamapohyautpattikaṃ guro|
indreṇa prāpitāḥ sātmyaṃ kiṃ tatsādhu kṛtaṃ hi taiḥ|| 20
अर्थ
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! मरुद्गणने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया था, जिसके कारण वे अपने जन्मजात असुरोचित भावको छोड़ सके और देवराज इन्द्रके द्वारा देवता बना लिये गये?॥ २०॥
कथं त आसुरं भावमपोह्यौत्पत्तिकं गुरो।
इन्द्रेण प्रापिताः सात्म्यं किं तत्साधु कृतं हि तैः॥ २०
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! मरुद्गणने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया था, जिसके कारण वे अपने जन्मजात असुरोचित भावको छोड़ सके और देवराज इन्द्रके द्वारा देवता बना लिये गये?॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 793) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/20/