॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.2.36
विमुच्य तमिमं बन्धमविद्याकामकर्मजम्।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो मैत्रः करुण आत्मवान्॥ ३६
vimucya tamimaṃ bandhamavidyākāmakarmajam|
sarvabhūtasuhṛcchānto maitraḥ karuṇa ātmavān|| 36
अर्थ
अज्ञानवश मैंने अपनेको शरीर समझकर उसके लिये बड़ी-बड़ी कामनाएँ कीं और उनकी पूर्तिके लिये अनेकों कर्म किये। उन्हींका फल है यह बन्धन! अब मैं इसे काटकर समस्त प्राणियोंका हित करूँगा, वासनाओंको शान्त कर दूँगा, सबसे मित्रताका व्यवहार करूँगा, दुःखियोंपर दया करूँगा और पूरे संयमके साथ रहूँगा॥ ३६॥✎ 498