श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.37

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

मोचये ग्रस्तमात्मानं योषिन्मय्याऽऽत्ममायया।

विक्रीडितो ययैवाहं क्रीडामृग इवाधमः॥ ३७

mocaye grastamātmānaṃ yoṣinmayyā''tmamāyayā|

vikrīḍito yayaivāhaṃ krīḍāmṛga ivādhamaḥ|| 37

अर्थ

भगवान्‌की मायाने स्त्रीका रूप धारण करके मुझ अधमको फाँस लिया और क्रीडामृगकी भाँति मुझे बहुत नाच नचाया। अब मैं अपने-आपको उस मायासे मुक्त करूँगा॥ ३७॥✎ 498

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #498 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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