श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.21

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

द्वादशैते विजानीमो धर्मं भागवतं भटाः।

गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं यं ज्ञात्वामृतमश्नुते॥ २१

dvādaśaite vijānīmo dharmaṃ bhāgavataṃ bhaṭāḥ|

guhyaṃ viśuddhaṃ durbodhaṃ yaṃ jñātvāmṛtamaśnute|| 21

अर्थ

भगवान्‌के द्वारा निर्मित भागवतधर्म परम शुद्ध और अत्यन्त गोपनीय है। उसे जानना बहुत ही कठिन है। जो उसे जान लेता है, वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। दूतो! भागवतधर्मका रहस्य हम बारह व्यक्ति ही जानते हैं—ब्रह्माजी, देवर्षि नारद, भगवान् शंकर, सनत्कुमार, कपिलदेव, स्वायम्भुव मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्मपितामह, बलि, शुकदेवजी और मैं (धर्मराज) ॥ २०-२१॥

यह अर्थ श्लोक 20–21 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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