इस जगत्में जीवोंके लिये बस, यही सबसे बड़ा कर्तव्य—परम धर्म है कि वे नाम-कीर्तन आदि उपायोंसे भगवान्के चरणोंमें भक्तिभाव प्राप्त कर लें॥ २२॥
एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥ २२
इस जगत्में जीवोंके लिये बस, यही सबसे बड़ा कर्तव्य—परम धर्म है कि वे नाम-कीर्तन आदि उपायोंसे भगवान्के चरणोंमें भक्तिभाव प्राप्त कर लें॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.3.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 714) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/3/22/