श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं गुरुम्।

यथाञ्जसा विजेष्यामः सपत्नांस्तव तेजसा॥ ३२

vṛṇīmahe tvopādhyāyaṃ brahmiṣṭhaṃ brāhmaṇaṃ gurum|

yathāñjasā vijeṣyāmaḥ sapatnāṃstava tejasā|| 32

अर्थ

तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अतः जन्मसे ही हमारे गुरु हो। हम तुम्हें आचार्यके रूपमें वरण करके तुम्हारी शक्तिसे अनायास ही शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेंगे॥ ३२॥

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