श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.11

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

हतपुत्रस्ततस्त्वष्टा जुहावेन्द्राय शत्रवे।

इन्द्रशत्रो विवर्धस्व माचिरं जहि विद्विषम्॥ ११

hataputrastatastvaṣṭā juhāvendrāya śatrave|

indraśatro vivardhasva māciraṃ jahi vidviṣam|| 11

अर्थ

विश्‍वरूपकी मृत्युके बाद उनके पिता त्वष्टा ‘हे इन्द्रशत्रो! तुम्हारी अभिवृद्धि हो और शीघ्र-से-शीघ्र तुम अपने शत्रुको मार डालो’—इस मन्त्रसे इन्द्रका शत्रु उत्पन्‍न करनेके लिये हवन करने लगे॥ ११॥

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