श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.20

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

एतद् भ्राम्यति मे बुद्धिर्दीपार्चिरिव वायुना।

ब्रूह्येतदद्भुततमं भगवांस्तत्र कारणम्॥ २०

etad bhrāmyati me buddhirdīpārciriva vāyunā|

brūhyetadadbhutatamaṃ bhagavāṃstatra kāraṇam|| 20

अर्थ

हवाके झोंकेसे लड़खड़ाती हुई दीपककी लौके समान मेरी बुद्धि इस विषयमें बहुत आगा-पीछा कर रही है। आप सर्वज्ञ हैं, अतः इस अद्भुत घटनाका रहस्य समझाइये॥ २०॥✎ 564 565 566 567

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #564 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #565 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #566 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #567 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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