हवाके झोंकेसे लड़खड़ाती हुई दीपककी लौके समान मेरी बुद्धि इस विषयमें बहुत आगा-पीछा कर रही है। आप सर्वज्ञ हैं, अतः इस अद्भुत घटनाका रहस्य समझाइये॥ २०॥✎ 564565566567
एतद् भ्राम्यति मे बुद्धिर्दीपार्चिरिव वायुना।
ब्रूह्येतदद्भुततमं भगवांस्तत्र कारणम्॥ २०
हवाके झोंकेसे लड़खड़ाती हुई दीपककी लौके समान मेरी बुद्धि इस विषयमें बहुत आगा-पीछा कर रही है। आप सर्वज्ञ हैं, अतः इस अद्भुत घटनाका रहस्य समझाइये॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 807) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/1/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)