श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.35

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

एवं तौ पार्षदौ विष्णोः पुत्रत्वं प्रापितौ दितेः।

हृदि स्थितेन हरिणा वैरभावेन तौ हतौ॥ ३५

evaṃ tau pārṣadau viṣṇoḥ putratvaṃ prāpitau diteḥ|

hṛdi sthitena hariṇā vairabhāvena tau hatau|| 35

अर्थ

युधिष्ठिर! इस प्रकार भगवान्‌के वे दोनों पार्षद जय और विजय दितिके पुत्र दैत्य हो गये थे। वे भगवान्‌से वैरभाव रखते थे। उनके हृदयमें रहनेवाले भगवान्‌ने उनका उद्धार करनेके लिये उन्हें मार डाला॥ ३५॥✎ 629 630

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #629 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #630 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें