नारदजी कहते हैं—धर्मराज! गुरुकुलमें निवास करनेवाला ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर दासके समान अपनेको छोटा माने, गुरुदेवके चरणोंमें सुदृढ़ अनुराग रखे और उनके हितके कार्य करता रहे॥ १॥
ब्रह्मचारी गुरुकुले वसन्दान्तो गुरोर्हितम्।
आचरन्दासवन्नीचो गुरौ सुदृढसौहृदः॥ १
नारदजी कहते हैं—धर्मराज! गुरुकुलमें निवास करनेवाला ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर दासके समान अपनेको छोटा माने, गुरुदेवके चरणोंमें सुदृढ़ अनुराग रखे और उनके हितके कार्य करता रहे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.12.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 879) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/12/1/