श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.21

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

ततस्त आशिषः सर्वा ददाम्यसुरपुङ्गव।

मर्त्यस्य ते अमर्त्यस्य दर्शनं नाफलं मम॥ २१

tatasta āśiṣaḥ sarvā dadāmyasurapuṅgava|

martyasya te amartyasya darśanaṃ nāphalaṃ mama|| 21

अर्थ

दैत्यशिरोमणे! इसीसे प्रसन्‍न होकर मैं तुम्हें जो कुछ माँगो, दिये देता हूँ। तुम हो मरनेवाले और मैं हूँ अमर! अतः तुम्हें मेरा यह दर्शन निष्फल नहीं हो सकता॥ २१॥

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