श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.54

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

वैतालिका ऊचुः

सभासु सत्रेषु तवामलं यशो

गीत्वा सपर्यां महतीं लभामहे।

यस्तां व्यनैषीद् भृशमेष दुर्जनो

दिष्ट्या हतस्ते भगवन्यथाऽऽमयः॥ ५४

sabhāsu satreṣu tavāmalaṃ yaśo

gītvā saparyāṃ mahatīṃ labhāmahe|

yastāṃ vyanaiṣīd bhṛśameṣa durjano

diṣṭyā hataste bhagavanyathā''mayaḥ|| 54

अर्थ

वैतालिकोंने कहा—भगवन्! बड़ी-बड़ी सभाओं और ज्ञानयज्ञोंमें आपके निर्मल यशका गान करके हम बड़ी प्रतिष्ठा-पूजा प्राप्त करते थे। इस दुष्टने हमारी वह आजीविका ही नष्ट कर दी थी। बड़े सौभाग्यकी बात है कि महारोगके समान इस दुष्टको आपने जड़मूलसे उखाड़ दिया॥ ५४॥

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