॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.10.54
ततः सुपर्णांसकृताङ्घ्रिपल्लवः
पिशङ्गवासा नवकञ्जलोचनः।
अदृश्यताष्टायुधबाहुरुल्लस-
च्छ्रीकौस्तुभानर्घ्यकिरीटकुण्डलः॥ ५४
tataḥ suparṇāṃsakṛtāṅghripallavaḥ
piśaṅgavāsā navakañjalocanaḥ|
adṛśyatāṣṭāyudhabāhurullasa-
cchrīkaustubhānarghyakirīṭakuṇḍalaḥ|| 54
अर्थ
बड़ी ही सुन्दर झाँकी थी। गरुडके कंधेपर उनके चरण-कमल विराजमान थे। नवीन कमलके समान बड़े ही कोमल नेत्र थे। पीताम्बर धारण किये हुए थे। आठ भुजाओंमें आठ आयुध, गलेमें कौस्तुभमणि, मस्तकपर अमूल्य मुकुट एवं कानोंमें कुण्डल झलमला रहे थे। देवताओंने अपने नेत्रोंसे भगवान्की इस छबिका दर्शन किया॥ ५४॥✎ 725