श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.54

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

ततः सुपर्णांसकृताङ्‌घ्रिपल्लवः

पिशङ्गवासा नवकञ्जलोचनः।

अदृश्यताष्टायुधबाहुरुल्लस-

च्छ्रीकौस्तुभानर्घ्यकिरीटकुण्डलः॥ ५४

tataḥ suparṇāṃsakṛtāṅghripallavaḥ

piśaṅgavāsā navakañjalocanaḥ|

adṛśyatāṣṭāyudhabāhurullasa-

cchrīkaustubhānarghyakirīṭakuṇḍalaḥ|| 54

अर्थ

बड़ी ही सुन्दर झाँकी थी। गरुडके कंधेपर उनके चरण-कमल विराजमान थे। नवीन कमलके समान बड़े ही कोमल नेत्र थे। पीताम्बर धारण किये हुए थे। आठ भुजाओंमें आठ आयुध, गलेमें कौस्तुभमणि, मस्तकपर अमूल्य मुकुट एवं कानोंमें कुण्डल झलमला रहे थे। देवताओंने अपने नेत्रोंसे भगवान्‌की इस छबिका दर्शन किया॥ ५४॥✎ 725

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #725 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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