परम पुरुष परमात्माके प्रकट होते ही उनके प्रभावसे असुरोंकी वह कपटभरी माया विलीन हो गयी—ठीक वैसे ही जैसे जग जानेपर स्वप्नकी वस्तुओंका पता नहीं चलता। ठीक ही है, भगवान्की स्मृति समस्त विपत्तियोंसे मुक्त कर देती है॥ ५५॥✎ 726727728729
तस्मिन्प्रविष्टेऽसुरकूटकर्मजा
माया विनेशुर्महिना महीयसः।
स्वप्नो यथा हि प्रतिबोध आगते
हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम्॥ ५५
परम पुरुष परमात्माके प्रकट होते ही उनके प्रभावसे असुरोंकी वह कपटभरी माया विलीन हो गयी—ठीक वैसे ही जैसे जग जानेपर स्वप्नकी वस्तुओंका पता नहीं चलता। ठीक ही है, भगवान्की स्मृति समस्त विपत्तियोंसे मुक्त कर देती है॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 957) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/10/55/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)