नमुचिने बड़े-बड़े पंद्रह बाणोंसे, जिनमें सोनेके पंख लगे हुए थे, इन्द्रको मारा और युद्धभूमिमें वह जलसे भरे बादलके समान गरजने लगा॥ २३॥✎ 1978
नमुचिः पञ्चदशभिः स्वर्णपुङ्खैर्महेषुभिः।
आहत्य व्यनदत्संख्ये सतोय इव तोयदः॥ २३
नमुचिने बड़े-बड़े पंद्रह बाणोंसे, जिनमें सोनेके पंख लगे हुए थे, इन्द्रको मारा और युद्धभूमिमें वह जलसे भरे बादलके समान गरजने लगा॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.11.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 959) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/11/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1978 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अपने → अपनी