श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.25

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अलक्षयन्तस्तमतीव विह्वला

विचुक्रुशुर्देवगणाः सहानुगाः।

अनायकाः शत्रुबलेन निर्जिता

वणिक्पथा भिन्‍ननवो यथार्णवे॥ २५

alakṣayantastamatīva vihvalā

vicukruśurdevagaṇāḥ sahānugāḥ|

anāyakāḥ śatrubalena nirjitā

vaṇikpathā bhinnanavo yathārṇave|| 25

अर्थ

इन्द्रको न देखकर देवता और उनके अनुचर अत्यन्त विह्वल होकर रोने-चिल्लाने लगे। एक तो शत्रुओंने उन्हें हरा दिया था और दूसरे अब उनका कोई सेनापति भी न रह गया था। उस समय देवताओंकी ठीक वैसी ही अवस्था हो रही थी, जैसे बीच समुद्रमें नाव टूट जानेपर व्यापारियोंकी होती है॥ २५॥

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