श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.35

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तपःसारमयं त्वाष्ट्रं वृत्रो येन विपाटितः।

अन्ये चापि३ बलोपेताः सर्वास्त्रैरक्षतत्वचः॥ ३५

tapaḥsāramayaṃ tvāṣṭraṃ vṛtro yena vipāṭitaḥ|

anye cāpi balopetāḥ sarvāstrairakṣatatvacaḥ|| 35

अर्थ

त्वष्टाकी तपस्याका सार ही वृत्रासुरके रूपमें प्रकट हुआ था! उसे भी मैंने इसी वज्रके द्वारा काट डाला था। और भी अनेकों दैत्य, जो बहुत बलवान् थे और किसी अस्त्र-शस्त्रसे जिनके चमड़ेको भी चोट नहीं पहुँचायी जा सकी थी, इसी वज्रसे मैंने मृत्युके घाट उतार दिये थे॥ ३५॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—चातिबलो०।

    (मुद्रित पृष्ठ 961)

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