॥ श्रीहरिः ॥
येन सम्मोहिता दैत्याः पायिताश्चामृतं सुराः।
तद् दिदृक्षव आयाताः परं कौतूहलं हि नः॥ १३
yena sammohitā daityāḥ pāyitāścāmṛtaṃ surāḥ|
tad didṛkṣava āyātāḥ paraṃ kautūhalaṃ hi naḥ|| 13
अर्थ
जिससे दैत्योंको मोहित करके आपने देवताओंको अमृत पिलाया, स्वामिन्! उसीको देखनेके लिये हम सब आये हैं। हमारे मनमें उसके दर्शनका बड़ा कौतूहल है॥ १३॥
येन सम्मोहिता दैत्याः पायिताश्चामृतं सुराः।
तद् दिदृक्षव आयाताः परं कौतूहलं हि नः॥ १३
जिससे दैत्योंको मोहित करके आपने देवताओंको अमृत पिलाया, स्वामिन्! उसीको देखनेके लिये हम सब आये हैं। हमारे मनमें उसके दर्शनका बड़ा कौतूहल है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 964) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/12/13/