श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.4

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

श्रीमहादेव उवाच

देवदेव जगद‍्व्यापिञ्जगदीश जगन्मय।

सर्वेषामपि२ भावानां त्वमात्मा हेतुरीश्‍वरः॥ ४✎ 965

devadeva jagadvyāpiñjagadīśa jaganmaya|

sarveṣāmapi bhāvānāṃ tvamātmā heturīśvaraḥ|| 4

अर्थ

श्रीमहादेवजीने कहा—समस्त देवोंके आराध्यदेव! आप विश्‍वव्यापी, जगदीश्‍वर एवं जगत्स्वरूप हैं। समस्त चराचर पदार्थोंके मूल कारण, ईश्‍वर और आत्मा भी आप ही हैं॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—मसि भूतानां त्व०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 963)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #965 शब्दोंके बीचका स्थान: सर्वेषामपिभावानां → सर्वेषामपि भावानां

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