॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.12.5
आद्यन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्यदहं बहिः।
यतोऽव्ययस्य नैतानि तत् सत्यं ब्रह्म चिद् भवान्॥ ५
ādyantāvasya yanmadhyamidamanyadahaṃ bahiḥ|
yato'vyayasya naitāni tat satyaṃ brahma cid bhavān|| 5
अर्थ
इस जगत्के आदि, अन्त और मध्य आपसे ही होते हैं; परन्तु आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं। आपके अविनाशी स्वरूपमें द्रष्टा, दृश्य, भोक्ता और भोग्यका भेदभाव नहीं है। वास्तवमें आप सत्य, चिन्मात्र ब्रह्म ही हैं॥ ५॥