श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.44

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यं४ मामपृच्छस्त्वमुपेत्य योगात्५

समासहस्रान्त उपारतं६ वै।

स एष७ साक्षात् पुरुषः पुराणो

न यत्र कालो विशते न वेदः॥ ४४

yaṃ māmapṛcchastvamupetya yogāt

samāsahasrānta upārataṃ vai|

sa eṣa sākṣāt puruṣaḥ purāṇo

na yatra kālo viśate na vedaḥ|| 44

अर्थ

जब मैं एक हजार वर्षकी समाधिसे उठा था, तब तुमने मेरे पास आकर पूछा था कि तुम किसकी उपासना करते हो। वे यही साक्षात् सनातन पुरुष हैं। न तो काल ही इन्हें अपनी सीमामें बाँध सकता है और न वेद ही इनका वर्णन कर सकता है। इनका वास्तविक स्वरूप अनन्त और अनिर्वचनीय है’॥ ४४॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—यन्माम०।

    (मुद्रित पृष्ठ 968)
  2. ५

    प्रा० पा०—योगं।

    (मुद्रित पृष्ठ 968)
  3. ६

    प्रा० पा०—उपारमद्वै।

    (मुद्रित पृष्ठ 968)
  4. ७

    प्रा० पा०—एव।

    (मुद्रित पृष्ठ 968)

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