॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.12.43
अपि व्यपश्यस्त्वमजस्य मायां
परस्य पुंसः परदेवतायाः।
अहं कलानामृषभो विमुह्ये
ययावशोऽन्ये३ किमुतास्वतन्त्राः॥ ४३
api vyapaśyastvamajasya māyāṃ
parasya puṃsaḥ paradevatāyāḥ|
ahaṃ kalānāmṛṣabho vimuhye
yayāvaśo'nye kimutāsvatantrāḥ|| 43
अर्थ
‘देवि! तुमने परम पुरुष परमेश्वर भगवान् विष्णुकी माया देखी? देखो, यों तो मैं समस्त कलाकौशल, विद्या आदिका स्वामी और स्वतन्त्र हूँ, फिर भी उस मायासे विवश होकर मोहित हो जाता हूँ। फिर दूसरे जीव तो परतन्त्र हैं ही; अतः वे मोहित हो जायँ—इसमें कहना ही क्या है॥ ४३॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—ययाञ्जसा वै किमुतापरो यः।