नाम और रूपकी मायासे प्राणियोंकी बुद्धि विमूढ़ हो रही है। इसलिये वे अनेक प्रकारके दर्शनशास्त्रोंके द्वारा महिमा तो भगवान्की ही गाते हैं, परन्तु उनके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान पाते॥ १०॥✎ 744745746
स्तूयमानो जनैरेभिर्मायया नामरूपया।
विमोहितात्मभिर्नानादर्शनैर्न च दृश्यते॥ १०
नाम और रूपकी मायासे प्राणियोंकी बुद्धि विमूढ़ हो रही है। इसलिये वे अनेक प्रकारके दर्शनशास्त्रोंके द्वारा महिमा तो भगवान्की ही गाते हैं, परन्तु उनके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान पाते॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.14.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 973) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/14/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)