वे मरीचि आदि प्रजापतियोंके रूपमें सृष्टिका विस्तार करते हैं, सम्राट्के रूपमें लुटेरोंका वध करते हैं और शीत, उष्ण आदि विभिन्न गुणोंको धारण करके कालरूपसे सबको संहारकी ओर ले जाते हैं॥ ९॥✎ 744745746
सर्गं प्रजेशरूपेण दस्यून्हन्यात् स्वराड्वपुः।
कालरूपेण सर्वेषामभावाय पृथग्गुणः॥ ९
वे मरीचि आदि प्रजापतियोंके रूपमें सृष्टिका विस्तार करते हैं, सम्राट्के रूपमें लुटेरोंका वध करते हैं और शीत, उष्ण आदि विभिन्न गुणोंको धारण करके कालरूपसे सबको संहारकी ओर ले जाते हैं॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.14.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 973) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/14/9/