श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.14.9

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

सर्गं४ प्रजेशरूपेण दस्यू५न्हन्यात् स्वराड्वपुः।

कालरूपेण सर्वेषामभावाय पृथग्गुणः॥ ९

sargaṃ prajeśarūpeṇa dasyūnhanyāt svarāḍvapuḥ|

kālarūpeṇa sarveṣāmabhāvāya pṛthagguṇaḥ|| 9

अर्थ

वे मरीचि आदि प्रजापतियोंके रूपमें सृष्टिका विस्तार करते हैं, सम्राट्के रूपमें लुटेरोंका वध करते हैं और शीत, उष्ण आदि विभिन्‍न गुणोंको धारण करके कालरूपसे सबको संहारकी ओर ले जाते हैं॥ ९॥✎ 744 745 746

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—सर्गे।

    (मुद्रित पृष्ठ 973)
  2. ५

    प्रा० पा०—हन्ता स्व०।

    (मुद्रित पृष्ठ 973)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #744 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #745 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #746 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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