॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.15.17
यत्र नित्यवयोरूपाः श्यामा विरजवाससः।
भ्राजन्ते रूपवन्नार्यो ह्यर्चिर्भिरिव वह्नयः॥ १७
yatra nityavayorūpāḥ śyāmā virajavāsasaḥ|
bhrājante rūpavannāryo hyarcirbhiriva vahnayaḥ|| 17
अर्थ
वहाँकी स्त्रियाँ सर्वदा सोलह वर्षकी-सी रहती हैं, उनका यौवन और सौन्दर्य स्थिर रहता है। वे निर्मल वस्त्र पहनकर अपने रूपकी छटासे इस प्रकार देदीप्यमान होती हैं, जैसे अपनी ज्वालाओंसे अग्नि॥ १७॥