श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.18

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

सुरस्त्रीकेशविभ्रष्टनवसौगन्धिकस्रजाम्।

यत्रामोदमुपादाय मार्ग आवाति मारुतः॥ १८

surastrīkeśavibhraṣṭanavasaugandhikasrajām|

yatrāmodamupādāya mārga āvāti mārutaḥ|| 18

अर्थ

देवांगनाओंके जूड़ेसे गिरे हुए नवीन सौगन्धिक पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर वहाँके मार्गोंमें मन्द-मन्द हवा चलती रहती है॥ १८॥✎ 1971

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1971 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौगन्धित → सौगन्धिक

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