देवांगनाओंके जूड़ेसे गिरे हुए नवीन सौगन्धिक पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर वहाँके मार्गोंमें मन्द-मन्द हवा चलती रहती है॥ १८॥✎ 1971
सुरस्त्रीकेशविभ्रष्टनवसौगन्धिकस्रजाम्।
यत्रामोदमुपादाय मार्ग आवाति मारुतः॥ १८
देवांगनाओंके जूड़ेसे गिरे हुए नवीन सौगन्धिक पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर वहाँके मार्गोंमें मन्द-मन्द हवा चलती रहती है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.15.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 976) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/15/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1971 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौगन्धित → सौगन्धिक