॥ श्रीहरिः ॥
हेमजालाक्षनिर्गच्छद्धूमेनागुरुगन्धिना ।
पाण्डुरेण प्रतिच्छन्नमार्गे यान्ति सुरप्रियाः॥ १९
hemajālākṣanirgacchaddhūmenāgurugandhinā |
pāṇḍureṇa praticchannamārge yānti surapriyāḥ|| 19
अर्थ
सुनहली खिड़कियोंमेंसे अगरकी सुगन्धसे युक्त सफेद धूआँ निकल-निकलकर वहाँके मार्गोंको ढक दिया करता है। उसी मार्गसे देवांगनाएँ जाती-आती हैं॥ १९॥✎ 1971
हेमजालाक्षनिर्गच्छद्धूमेनागुरुगन्धिना ।
पाण्डुरेण प्रतिच्छन्नमार्गे यान्ति सुरप्रियाः॥ १९
सुनहली खिड़कियोंमेंसे अगरकी सुगन्धसे युक्त सफेद धूआँ निकल-निकलकर वहाँके मार्गोंको ढक दिया करता है। उसी मार्गसे देवांगनाएँ जाती-आती हैं॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.15.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 976) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/15/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1971 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौगन्धित → सौगन्धिक