श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.29

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

भवद्विधो भवान्वापि वर्जयित्वेश्‍वरं हरिम्।

नास्य शक्तः पुरः स्थातुं कृतान्तस्य यथा जनाः॥ २९

bhavadvidho bhavānvāpi varjayitveśvaraṃ harim|

nāsya śaktaḥ puraḥ sthātuṃ kṛtāntasya yathā janāḥ|| 29

अर्थ

सर्वशक्तिमान् भगवान्‌को छोड़कर तुम या तुम्हारे-जैसा और कोई भी बलिके सामने उसी प्रकार नहीं ठहर सकता, जैसे कालके सामने प्राणी॥ २९॥✎ 747

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #747 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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