श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अदितिरुवाच

भद्रं द्विजगवां ब्रह्मन्धर्मस्यास्य जनस्य च।

त्रिवर्गस्य परं क्षेत्रं गृहमेधिन्गृहा इमे॥ ११

bhadraṃ dvijagavāṃ brahmandharmasyāsya janasya ca|

trivargasya paraṃ kṣetraṃ gṛhamedhingṛhā ime|| 11

अर्थ

अदितिने कहा—भगवन्! ब्राह्मण, गौ, धर्म और आपकी यह दासी—सब सकुशल हैं। मेरे स्वामी! यह गृहस्थ-आश्रम ही अर्थ, धर्म और कामकी साधनामें परम सहायक है॥ ११॥

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